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हनुमान चालीसा रचना की रोचक कहानी

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भगवान को अगर किसी युग में आसानी से प्राप्त किया जा सकता है तो वह युग है कलियुग। इस कथन को सत्य करता एक दोहा रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लिखा है:

कलियुग केवल नाम अधारा, सुमिर सुमिर नर उतरहि पारा।

जिसका अर्थ है कि कलयुग में मोक्ष प्राप्त करने का एक ही लक्ष्य है वो है भगवान का नाम लेना। तुलसीदास ने अपने पूरे जीवन में कोई भी ऐसी बात नहीं लिखी जो गलत हो। उन्होंने अध्यात्म जगत को बहुत सुन्दर रचनाएँ दी हैं।

ऐसा माना जाता है कि कलयुग में हनुमान जी सबसे जल्दी प्रसन्न हो जाने वाले भगवान हैं। उन्होंने हनुमान जी की स्तुति में कई रचनाएँ रची जिनमें हनुमान बाहुक, हनुमानाष्टक और हनुमान चालीसा प्रमुख हैं।

हनुमान चालीसा की रचना के पीछे एक बहुत ही रोचक कहानी है जिसकी जानकारी शायद ही किसी को हो। आइये जानते हैं हनुमान चालीसा की रचना की कहानी:

ये बात उस समय की है जब भारत पर मुग़ल सम्राट अकबर का राज्य था। सुबह का समय था, एक महिला ने पूजा से लौटते हुए तुलसीदास जी के पैर छुए। तुलसीदास जी ने नियमानुसार उसे सौभाग्यशाली होने का आशीर्वाद दिया।

आशीर्वाद मिलते ही वो महिला फूट-फूट कर रोने लगी और रोते हुए उसने बताया कि अभी-अभी उसके पति की मृत्यु हो गई है। इस बात का पता चलने पर भी तुलसीदास जी जरा भी विचलित न हुए और वे अपने आशीर्वाद को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थे।

क्योंकि उन्हें इस बात का ज्ञान भली भाँति था कि भगवान राम बिगड़ी बात संभाल लेंगे और उनका आशीर्वाद खाली नहीं जाएगा। उन्होंने उस औरत सहित सभी को राम नाम का जाप करने को कहा। वहां उपस्थित सभी लोगों ने ऐसा ही किया और वह मरा हुआ व्यक्ति राम नाम के जाप आरंभ होते ही जीवित हो उठा।

यह बात पूरे राज्य में जंगल की आग की तरह फैल गई। जब यह बात बादशाह अकबर के कानों तक पहुंची तो उसने अपने महल में तुलसीदास को बुलाया और भरी सभा में उनकी परीक्षा लेने के लिए कहा कि कोई चमत्कार दिखाएँ।

ये सब सुन कर तुलसीदास जी ने अकबर से बिना डरे उसे बताया की वो कोई चमत्कारी बाबा नहीं हैं, सिर्फ श्री राम जी के भक्त हैं। अकबर इतना सुनते ही क्रोध में आ गया और उसने उसी समय सिपाहियों से कह कर तुलसीदास जी को कारागार में डलवा दिया।

तुलसीदास जी ने तनिक भी प्रतिक्रिया नहीं दी और राम का नाम जपते हुए कारागार में चले गए। उन्होंने कारागार में भी अपनी आस्था बनाए रखी और वहां रह कर ही हनुमान चालीसा की रचना की और लगातार 40 दिन तक उसका निरंतर पाठ किया।

चालीसवें दिन एक चमत्कार हुआ। हजारों बंदरों ने एक साथ अकबर के राज्य पर हमला बोल दिया। अचानक हुए इस हमले से सब अचंभित हो गए।

अकबर एक सूझवान बादशाह था इसलिए इसका कारण समझते देर न लगी। उसे भक्ति की महिमा समझ में आ गई। उसने उसी क्षण तुलसीदास जी से क्षमा मांग कर कारागार से मुक्त किया और आदर सहित उन्हें विदा किया। इतना ही नहीं, अकबर ने उस दिन के बाद तुलसीदास जी से जीवनभर मित्रता निभाई।

इस तरह तुलसीदास जी ने एक व्यक्ति को कठिनाई की घड़ी से निकलने के लिए हनुमान चालीसा के रूप में एक ऐसा रास्ता दिया है। जिस पर चल कर हम किसी भी मंजिल को प्राप्त कर सकते हैं।

इस तरह हमें भी भगवान में अपनी आस्था को बरक़रार रखना चाहिए। ये दुनिया एक उम्मीद पर टिकी है। अगर विश्वास ही न हो तो हम दुनिया का कोई भी काम नहीं कर सकते।


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श्री श्री दामोदराष्टकं

नमामीश्वरं सच्चिदानन्दरूपं
लसत्कुण्डलं गोकुले भ्राजमानम् ।
यशोदाभियोलूखलाद्धावमानं
परामृष्टमत्यन्ततो द्रुत्य गोप्या ॥ १ ॥

वह भगवान जिनका रूप सत, चित और आनंद से परिपूर्ण है, जिनके मकरो के आकार के कुंडल इधर उधर हिल रहे है, जो गोकुल नामक अपने धाम में नित्य शोभायमान है, जो (दूध और दही से भरी मटकी फोड़ देने के बाद) मैय्या यशोदा की डर से ओखल से कूदकर अत्यंत तेजीसे दौड़ रहे है और जिन्हें यशोदा मैय्या ने उनसे भी तेज दौड़कर पीछे से पकड़ लिया है ऐसे श्री भगवान को मै नमन करता हू ।।1।।

रुदन्तं मुहुर्नेत्रयुग्मं मृजन्तं
कराम्भोजयुग्मेन सातङ्कनेत्रम् ।
मुहुः श्वासकम्पत्रिरेखाङ्ककण्ठ-
स्थितग्रैव-दामोदरं भक्तिबद्धम् ॥ २ ॥

(अपने माता के हाथ में छड़ी देखकर) वो रो रहे है और अपने कमल जैसे कोमल हाथो से दोनों नेत्रों को मसल रहे है, उनकी आँखे भय से भरी हुयी है और उनके गले का मोतियो का हार, जो शंख के भाति त्रिरेखा से युक्त है, रोते हुए जल्दी जल्दी श्वास लेने के कारण इधर उधर हिल-डुल रहा है , ऐसे उन श्री भगवान् को जो रस्सी से नहीं बल्कि अपने माता के प्रेम से बंधे हुए है मै नमन करता हुँ।।

इतीदृक् स्वलीलाभिरानन्दकुण्डे
स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम् ।
तदीयेषिताज्ञेषु भक्तैर्जितत्वं
पुनः प्रेमतस्तं शतावृत्ति वन्दे ॥ ३ ॥

ऐसी बाल्यकाल की लीलाओ के कारण वे गोकुल के रहिवासीओ को आध्यात्मिक प्रेम के आनंद कुंड में डुबो रहे है, और जो अपने ऐश्वर्य सम्पूर्ण और ज्ञानी भक्तो को ये बतला रहे है की “मै अपने ऐश्वर्य हिन और प्रेमी भक्तो द्वारा जीत लिया गया हु”, ऐसे उन दामोदर भगवान को मै शत शत नमन करता हु ।।

वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा
न चान्यं वृणेऽहं वरेषादपीह ।
इदं ते वपुर्नाथ गोपालबालं
सदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यैः ॥ ४ ॥

हे भगवन, आप सभी प्रकार के वर देने में सक्षम होने पर भी मै आप से ना ही मोक्ष की कामना करता हु, ना ही मोक्षका सर्वोत्तम स्वरुप श्री वैकुंठ की इच्छा रखता हु, और ना ही नौ प्रकार की भक्ति से प्राप्त किये जाने वाले कोई भी वरदान की कामना करता हु । मै तो आपसे बस यही प्रार्थना करता हु की आपका ये बालस्वरूप मेरे हृदय में सर्वदा स्थित रहे, इससे अन्य और कोई वस्तु का मुझे क्या लाभ ?

इदं ते मुखाम्भोजमत्यन्तनीलैर्-
वृतं कुन्तलैः स्निग्ध-रक्तैश्च गोप्या ।
मुहुश्चुम्बितं बिम्बरक्तधरं मे
मनस्याविरास्तां अलं लक्षलाभैः ॥ ५ ॥

हे प्रभु, आपका श्याम रंग का मुखकमल जो कुछ घुंघराले लाल बालो से आच्छादित है, मैय्या यशोदा द्वारा बार बार चुम्बन किया जा रहा है, और आपके ओठ बिम्बफल जैसे लाल है, आपका ये अत्यंत सुन्दर कमलरुपी मुख मेरे हृदय में विराजीत रहे । (इससे अन्य) सहस्त्रो वरदानो का मुझे कोई उपयोग नहीं है ।

नमो देव दामोदरानन्त विष्णो
प्रसीद प्रभो दुःखजालाब्धिमग्नम् ।
कृपादृष्टिवृष्ट्यातिदीनं बतानु
गृहाणेश मां अज्ञमेध्यक्षिदृश्यः ॥ ६ ॥

हे प्रभु, मेरा आपको नमन है । हे दामोदर, हे अनंत, हे विष्णु, आप मुझपर प्रसन्न होवे (क्यूंकि) मै संसाररूपी दुःख के समुन्दर में डूबा जा रहा हु । मुझ दिन हिन पर आप अपनी अमृतमय कृपा की वृष्टि कीजिये और कृपया मुझे दर्शन दीजिये ।।

कुवेरात्मजौ बद्धमूर्त्यैव यद्वत्
त्वया मोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च ।
तथा प्रेमभक्तिं स्वकं मे प्रयच्छ
न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह ॥ ७ ॥

हे दामोदर (जिनके पेट से रस्सी बंधी हुयी है वो), आपने माता यशोदा द्वारा ओखल में बंधे होने के बाद भी कुबेर के पुत्रो (मणिग्रिव तथा नलकुबेर) जो नारदजी के श्राप के कारण वृक्ष के रूप में मूर्ति की तरह स्थित थे, उनका उद्धार किया और उनको भक्ति का वरदान दिया, आप उसी प्रकार से मुझे भी प्रेमभक्ति प्रदान कीजिये, यही मेरा एकमात्र आग्रह है, किसी और प्रकार की कोई भी मोक्ष के लिए मेरी कोई कामना नहीं है ।

नमस्तेऽस्तु दाम्ने स्फुरद्दीप्तिधाम्ने
त्वदीयोदरायाथ विश्वस्य धाम्ने ।
नमो राधिकायै त्वदीयप्रियायै
नमोऽनन्तलीलाय देवाय तुभ्यम् ॥ ८ ॥

हे दामोदर, आपके उदर से बंधी हुयी महान रज्जू (रस्सी) को प्रणाम है, और आपके उदर, जो निखिल ब्रह्म तेज का आश्रय है, और जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का धाम है, को भी प्रणाम है । श्रीमती राधिका जो आपको अत्यंत प्रिय है उन्हें भी प्रणाम है, और हे अनंत लीलाएँ करने वाले भगवन, आपको प्रणाम है ।

हरे कृष्ण


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संत कबीर का उपदेश

संत कबीर जी पेड़ों की झुरमट तले बैठे थे | उनके पास की एक शाखा पर एक पिंजरा टंगा था, जिसमें एक मैना फुदक रही थी | बड़ी अनूठी थी, वह मैना | खूब गिटरपिटर मनुष्यों की सी बोली बोल रही थी | कबीर जी भी उससे बातें कर रहे थे |

इतने में, नगर सेठ अपनी पत्नी के साथ कबीर जी के क़दमों में हाज़िर हुआ | मन की भावना रखी – ‘महाराज, मेरे सिर के बाल पक चले हैं | घर-गृहस्थी के दायित्व भी पूरे हो गए हैं | सोच रहा हूँ, हमारी सनातन परम्परा के चार आश्रमों में से तीसरी पौड़ी ‘वानप्रस्थ’ की और बढ़ चलूँ | एकांत में सुमिरन-भजन करूँ |’

कबीर, बिना किसी लाग-लपेट के, एकदम खरा बोले- ‘सेठ जी, यूँ वन में इत-उत डोलने से हरि नहीं मिलता!’

सेठ – फिर कैसे मिलता है, हरि ? आप बता दें महाराज |

कबीर फिर मैना से बतियाने लगे – ‘मैना रानी, बोल – राम…राम… !’ मैना ने दोहराया – ‘राम…राम |’ कबीर उससे ढेरों बातें करने लगे | सेठ-सेठानी को इतना साफ बोलते देखकर खुश हो रहे थे… कि तभी कबीर उनकी और मुड़े और बोले – ‘जानते हो सेठ जी, मैना को मनुष्यी बोली कैसे सिखाई जाती है? आप उसके सामने खड़े होकर उसे कुछ बोलना सिखाओगे, तो वह कभी नहीं सीखेगी | इसलिए मैंने एक दर्पण लिया और उसकी आड़ में छिपकर बैठ गया | दर्पण के सामने पिंजरा था | मैं दर्पण के पीछे से बोला – ‘राम! राम!’ मैना ने दर्पण में अपनी छवि देखी | उसे लगा उसका कोई भाई-बंधु कह रहा है- ‘राम! राम!’ इसलिए वह भी झट सीख और समझ गई | इसी तरह दर्पण की आड़ में मैंने उसे पूरी मनुष्यी बोली सिखाई | और अब देखो, यह कितना फटाफट बोलती है…!’

इतना कहकर कबीर ताली बजाकर हँस दिए | फिर इसी मौज में, सेठ-सेठानी से सहजता से बोल गए – ‘ऐसे ही सेठ जी भगवान कैसे मिलता है, यह तो खुद भगवान ही बता सकता है | लेकिन अगर वह यूँ ही सीधा बताएगा, तो तुम्हारी बुद्धि को समझ नहीं पड़ेगी | इसलिए वह मानव चोले की आड़ में आता है और ब्रह्मज्ञान का सबक सिखाता है – ब्रह्म बोले काया के ओले | काया बिन ब्रह्म कैसे बोले || वह मानव बनकर आता है, मानव को अपनी बात समझाने | उस महामानव को, मनुष्य देह में अवतरित ब्रह्म को ही हम ‘सतगुरू’ सच्चा गुरु या साधू’ कहते हैं |

निराकार की आरसी, साधों ही की देहि |

लखा जो चाहै अलख को, इनही में लखि लेहि ||

अर्थात सदगुरू की साकार देह निराकार ब्रह्म का दर्पण है | वो अलख (न दिखाई देने वाला) प्रभु सच्चे गुरू की देह में प्रत्यक्ष हो आता है |

इसलिए सेठ जी, अगर भगवान को पाना है, तो ‘वानप्रस्थ’ नहीं, ‘गुरूप्रस्थ’ बनो | सदगुरू के देस चलो –

चलु कबीर वा देस में,

जहँ बैदा सतगुरू होय

सेठ – सोलह आने सच बात, महाराज | मगर एक दुविधा है | दास जानना चाहता है कि मनुष्य चोले में तो कई पाखंडी स्वयं को ‘गुरू’ कहलाते घूमते हैं | फिर हम ज्ञानीजन कैसे पहचाने कि इस काया में साकार ब्रह्म है या कोई ढोंगी है ?

कबीर ने प्रशंसा भरी दृष्टि से सेठ जी को देखा – ‘उत्तम प्रश्न किया है आपने |

जब तक देखूं न अपनी नैनी, तब तक पतीजूं न गुरू की वैणी

– सोच-समझ कर, देखभाल कर ही किसी को सदगुरु दर्जा देना चाहिए |

भई, मैं अपनी राय कहूँ, तो –

साधो सो सतगुरू मोहिं भावै | सत नाम नाम का भरि भरि प्याला, आप पिवै मोहिं प्यावै ||

मुझे तो ऐसा सदगुरु भाता है, जो प्रभु के अव्यक्त आदिनाम का अमृत मुझे पिला दे |

परदा दूरि करै आँखिन का, निज दरसन दिखलावै | जा के दरसन साहिब दरसै, अनहद सबद सुनावै |

जो प्रभु की सिर्फ मीठी-मीठी बातों में न बहलाए | बल्कि मेरी आँख पर से अज्ञानता का पर्दा हटा दे, मेरा शिव – नेत्र (दिव्य दृष्टि) खोल दे और साहिब का साक्षात् दीदार करा दे, और मेरे अंतर्जगत में अनहद बाणी गूँज उठे… वही पूरा तत्वदर्शी गुरू है | वही सत्पुरश है |’

उधर सेठ-सेठानी और इधर हंस मनमुखा गदगद हो चुके थे | दोनों हंसों को ‘गुरू क्यों? और गुरू कैसा?’ – इन दो सीखों के बेशकीमती मोती मिल चुके थे | वे उन्हें अपनी चोंच से चुग कर, ‘संतों के देस’ से वापिस लौट रहे थे |

आपके अंदर के हंस

आपके अंदर ही ये दोनों हंस रहते हैं – आपका मन (मनमुखा) और आपकी आत्मा (आत्माराम) | आपका हंस आत्माराम परमात्मा के दर्शन के लिए व्याकुल है | पर हंस मनमुखा उसका साथ देने को तैयार नहीं होता | माने वह किसी सदगुरु, तत्वदर्शी सत्पुरश से ज्ञान-दीक्षा लेने के लिए राजी नहीं होता | पर अब तो आपके दोनों हंसों ने ‘संतों के देस’ की सैर कर ली है और सत्संग के मोती भी पा लिए हैं | तो क्या अब आपका ‘मनमुखा’ माना ?

यदि अब भी नहीं माना, तो उसे बारम्बार संस्थान के सत्संग पंडालों में लाना न भूलें, ताकि वह संतों की और वाणियाँ सुन पाए और यदि वह मान गया, तो फिर विलम्ब न कीजिए | ‘ब्रह्मज्ञान’ की दीक्षा पाकर ‘सुख’ से आनंद की ओर बढ़ जाइए |

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विवाहिता स्त्री को गुरू करना चाहिये या नहीं ?

आइए इसके बारे में हमारे शास्त्र क्या कहते हैं, देखें।

शास्त्रीय दृष्टिकोण

पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई।

  1. पदम पुराण

“गुरूग्निद्विर्जातिनां वर्णाणां ब्रह्मणो गुरूः।
पतिरेकोगुरू स्त्रीणां सर्वस्याम्यगतो गुरूः।।”
(पदम पुं . स्वर्ग खं 40-75)

अर्थ: अग्नि ब्राह्मणों का गुरू है। अन्य वर्णों का ब्राह्मण गुरू है। एक मात्र उनका पति ही स्त्रियों का गुरू है, तथा अतिथि सब का गुरू है।

  1. ब्रह्मवैवर्त पुराण

“पतिर्बन्धु गतिर्भर्ता दैवतं गुरूरेव च।
सर्वस्याच्च परः स्वामी न गुरू स्वामीनः परः।।”
(ब्रह्मवैवतं पु. कृष्ण जन्म खं 57-11)

अर्थ: स्त्रियों का सच्चा बन्धु पति है, पति ही उसकी गति है। पति ही उसका एक मात्र देवता है। पति ही उसका स्वामी है और स्वामी से ऊपर उसका कोई गुरू नहीं।

  1. स्कन्द पुराण

“भर्ता देवो गुरूर्भता धर्मतीर्थव्रतानी च।
तस्मात सर्वं परित्यज्य पतिमेकं समर्चयेत्।।”
(स्कन्द पु. काशी खण्ड पूर्व 30-48)

अर्थ: स्त्रियों के लिए पति ही इष्ट देवता है। पति ही गुरू है। पति ही धर्म है, तीर्थ और व्रत आदि है। स्त्री को पृथक कुछ करना अपेक्षित नहीं है।

  1. श्रीमद् भागवत

“दुःशीलो दुर्भगो वृध्दो जड़ो रोग्यधनोSपि वा।
पतिः स्त्रीभिर्न हातव्यो लोकेप्सुभिरपातकी।।”
(श्रीमद् भा. 10-29-25)

अर्थ: पतिव्रता स्त्री को पति के अलावा और किसी को पूजना नहीं चाहिए, चाहे पति बुरे स्वभाव वाला हो, भाग्यहीन, वृद्ध, मूर्ख, रोगी या निर्धन हो। पर वह पातकी न होना चाहिए।

रामचरितमानस में माता अनसूया का उपदेश

माता अनसूया ने माता सीता को पतिव्रत धर्म का उपदेश देते हुए कहा:

मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥ अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही॥

भावार्थ: हे राजकुमारी! माता, पिता, भाई सभी हितकारी हैं, परंतु पति ही (मोक्ष रूप) असीम सुख देने वाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती।

धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥ बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥

भावार्थ: धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी और अत्यंत दीन पति भी अपमान का पात्र नहीं है।

ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना॥ एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा॥

भावार्थ: ऐसे पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भाँति-भाँति के दुःख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिए सबसे बड़ा धर्म, व्रत और नियम है।

जग पतिब्रता चारि बिधि अहहीं। बेद पुरान संत सब कहहीं॥ उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं॥

भावार्थ: जगत में चार प्रकार की पतिव्रताएँ हैं। वेद, पुराण और संत कहते हैं कि उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में यह भाव होता है कि जगत में (मेरे पति को छोड़कर) दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है।

मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैसें॥ धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई॥

भावार्थ: मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराए पति को अपने सगा भाई, पिता या पुत्र के समान देखती है। जो धर्म को विचारकर और अपने कुल की मर्यादा समझकर पतिव्रता बनी रहती है, अर्थात् इस दबाव में पतिव्रता बनी रहती है, वह निकृष्ट स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं।

बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई॥ पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई॥

भावार्थ: जो स्त्री मौका न मिलने से या भयवश पतिव्रता बनी रहती है, उसे अधम स्त्री जानना। पति को धोखा देने वाली स्त्री पराए पति से रति करती है, वह सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है।

छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥ बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥

भावार्थ: क्षणभर के सुख के लिए जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुःख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पतिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है।

पति प्रतिकूल जनम जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई॥

भावार्थ: जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर विधवा हो जाती है।

सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ। जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय॥

भावार्थ: स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। (पतिव्रत धर्म के कारण ही) आज भी ‘तुलसीजी’ भगवान को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं।

निष्कर्ष

वेदों, पुराणों, भागवत आदि शास्त्रों ने स्त्री को बाहर का गुरू न करने के लिए कहा है, यह शास्त्रों के उपरोक्त श्लोकों से ज्ञात होता है।

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सच्चा बादशाह

एक बड़े देश का राजा था। उसके देश में एक गरीब आदमी रहता था, जो हमेशा राजा से हाथ मिलाने की इच्छा रखता था। जब भी वह किसी बड़े आदमी को राजा से हाथ मिलाते देखता, उसके मन में भी यह तमन्ना जाग उठती। धीरे-धीरे यह तमन्ना बढ़ती गई और उसने ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, वह राजा से हाथ मिलाकर रहेगा।

एक दिन वह आदमी किसी संत के पास गया और अपनी इच्छा बताई। संत ने कहा कि इसके लिए तुझे सब्र और मेहनत करनी पड़ेगी, क्रोध और लालच का त्याग करना पड़ेगा और समय भी लगेगा। आदमी ने यह सब करने के लिए तैयार हो गया। संत ने उसे सलाह दी कि राजा एक महल तैयार करवा रहा है, वह वहां जाकर बिना किसी लालच के भेदभाव के ईमानदारी से काम करे।

वह आदमी महल में काम करने लगा। जब भी शाम को राजा का मंत्री मजदूरी देता, वह कह देता कि यह अपना ही काम है, अपने काम की मजदूरी कैसी। वह दिन-रात मेहनत करता और खाली नहीं बैठता। समय बीतता गया और महल तैयार हो गया। उसने महल के चारों ओर सुंदर-सुंदर फूल और पेड़ लगाकर उसे इतना खूबसूरत बना दिया कि जो भी देखता, देखता ही रह जाता।

एक दिन राजा महल देखने आया और उसे देखकर बहुत खुश हुआ। उसने मंत्री से पूछा कि इतनी सजावट किसने की है। मंत्री ने बताया कि यह कोई आपका ही रिश्तेदार है, जिसने 12 साल से मजदूरी नहीं ली और अन्य मजदूरों से अधिक काम किया है। जब भी मजदूरी देने की बात होती, वह कहता कि अपना ही काम है, अपने काम की मजदूरी कैसी।

राजा सोच में पड़ गया कि ऐसा कौन सा रिश्तेदार है। उसने कहा कि उसे बुलाओ। आदमी को बुलाया गया और राजा ने उसका खड़े होकर स्वागत किया और हाथ मिलाया। फिर राजा ने उससे उसका परिचय लिया। परिचय के बाद राजा को हैरानी हुई कि यह रिश्तेदार भी नहीं है और मजदूरी भी नहीं ली है, और सेवाभाव से काम भी किया है। राजा बहुत खुश हुआ और कहा कि मांगो क्या मांगते हो। आदमी ने कहा कि जी, कुछ नहीं, जो चाहता था, वह मिल गया। उसने सारी बात बताई।

राजा ने कहा कि अब तेरा मुझसे हाथ मिल गया है, अब तू बेपरवाह है, सब सुख तेरे अधीन है, अब तू भी बादशाह है। जो कुछ मेरा है, वह तेरा है।

इस कहानी का मतलब है कि हमें उस मालिक बादशाह की भक्ति जी जान से, दिल लगाकर पूरी ईमानदारी से करनी चाहिए। जब उससे अपना हाथ मिल जाएगा, तो कोई कमी नहीं रहेगी। अगर एक दुनिया का राजा खुश होकर इतना कुछ दे सकता है, तो खुद परमात्मा से हाथ मिलाने पर क्या कमी होगी।

अपने सतगुरु को खुश करो, चाहे जैसे भी करो। यही सच्ची भक्ति है। उससे हाथ मिलाकर उसके जैसे हो जाओ, वह बादशाह है और तुम्हें भी बादशाह बना देगा।

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शरद पूर्णिमा

वर्ष के बारह महीनों में शरद पूर्णिमा ऐसी पूर्णिमा है, जो तन, मन और धन तीनों के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इस दिन चंद्रमा की किरणों से अमृत की वर्षा होती है, और धन की देवी महालक्ष्मी रात को यह देखने के लिए निकलती हैं कि कौन जाग रहा है और अपने कर्मनिष्ठ भक्तों को धन-धान्य से भरपूर करती हैं।

कोजागरी पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा का एक नाम कोजागरी पूर्णिमा भी है, यानी लक्ष्मी जी पूछती हैं – “कौन जाग रहा है?” अश्विन महीने की पूर्णिमा को चंद्रमा अश्विनी नक्षत्र में होता है, इसलिए इस महीने का नाम अश्विन पड़ा है।

चंद्रमा की विशेषताएँ

एक महीने में चंद्रमा जिन 27 नक्षत्रों में भ्रमण करता है, उनमें अश्विनी नक्षत्र सबसे पहला है, और इसकी पूर्णिमा आरोग्य देती है। केवल शरद पूर्णिमा को ही चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से संपूर्ण होता है और पृथ्वी के सबसे ज्यादा निकट होता है। चंद्रमा की किरणों से इस दिन अमृत बरसता है।

आयुर्वेद और शरद पूर्णिमा

आयुर्वेदाचार्य वर्ष भर इस पूर्णिमा की प्रतीक्षा करते हैं। जीवनदायिनी रोगनाशक जड़ी-बूटियों को शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखा जाता है। अमृत से नहाई इन जड़ी-बूटियों से बनी दवाइयाँ रोगी पर तुरंत असर करती हैं।

चंद्रमा और मन

चंद्रमा को वेद-पुराणों में मन के समान माना गया है – चंद्रमा मनसो जातः। वायु पुराण में चंद्रमा को जल का कारक बताया गया है। प्राचीन ग्रंथों में चंद्रमा को औषधीश यानी औषधियों का स्वामी कहा गया है।

शरद पूर्णिमा की खीर

शरद पूर्णिमा की शीतल चांदनी में रखी खीर खाने से शरीर के सभी रोग दूर होते हैं। ज्येष्ठ, आषाढ़, सावन, और भाद्रपद मास में शरीर में पित्त का संचय हो जाता है, जो शरद पूर्णिमा की शीतल धवल चांदनी में रखी खीर से बाहर निकलता है।

यह खीर एक विशेष विधि से बनाई जाती है। पूरी रात चांदनी में रखने के बाद सुबह खाली पेट इसे खाने से सभी रोग दूर होते हैं, और शरीर निरोगी होता है।

रास पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण से भी यह पूर्णिमा जुड़ी है। इस रात को श्रीकृष्ण अपनी राधा रानी और अन्य सखियों के साथ महारास रचाते हैं। कहते हैं, जब वृन्दावन में भगवान कृष्ण महारास रचा रहे थे तो चंद्रमा आसमान से सब देख रहा था और वह इतना भाव-विभोर हुआ कि उसने अपनी शीतलता के साथ पृथ्वी पर अमृत की वर्षा आरंभ कर दी।

उत्सव और परंपराएँ

गुजरात में शरद पूर्णिमा को लोग रास रचाते हैं और गरबा खेलते हैं। मणिपुर में भी श्रीकृष्ण भक्त रास रचाते हैं। पश्चिम बंगाल और ओडिशा में शरद पूर्णिमा की रात को महालक्ष्मी की विधि-विधान के साथ पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस पूर्णिमा को जो महालक्ष्मी का पूजन करते हैं और रात भर जागते हैं, उनकी सभी कामनाएँ पूरी होती हैं।

कुमार पूर्णिमा

ओडिशा में शरद पूर्णिमा को कुमार पूर्णिमा के नाम से मनाया जाता है। आदिदेव महादेव और देवी पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म इसी पूर्णिमा को हुआ था। गौर वर्ण, आकर्षक, सुंदर कार्तिकेय की पूजा कुंवारी लड़कियां उनके जैसा पति पाने के लिए करती हैं।

ऋतु परिवर्तन और कार्तिक स्नान

शरद पूर्णिमा ऐसे महीने में आती है जब वर्षा ऋतु अंतिम समय पर होती है। शरद ऋतु अपने बाल्यकाल में होती है और हेमंत ऋतु आरंभ हो चुकी होती है। इसी पूर्णिमा से कार्तिक स्नान प्रारंभ हो जाता है।


शरद पूर्णिमा की महिमा अनंत है और इसकी धार्मिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य संबंधी महत्ता अद्वितीय है। यह पूर्णिमा हमें तन, मन और धन की समृद्धि का संदेश देती है और हमें अपने जीवन को शुद्ध और पवित्र बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है।

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पाँच अपवित्र पवित्र वस्तुएँ

पाँच वस्तु जो अपवित्र होते हुए भी पवित्र मानी जाती हैं

उच्छिष्टं शिवनिर्माल्यं वमनं शवकर्पटम्। काकविष्टा ते पञ्चैते, पवित्राति मनोहरा॥

  1. उच्छिष्ट – गाय का दूध, गाय का दूध पहले उसका बछड़ा पीकर उच्छिष्ट करता है, फिर भी वह पवित्र होता है और शिव पर चढ़ता है।
  2. शिव निर्माल्यं – गंगा का जल, गंगा जी का अवतरण स्वर्ग से सीधा शिव जी के मस्तक पर हुआ। नियमानुसार शिव जी पर चढ़ाई हुई हर चीज़ निर्माल्य है, पर गंगाजल पवित्र है।
  3. वमनम् – उल्टी, शहद। मधुमख्खी जब फूलों का रस लेकर अपने छत्ते पर आती है, तब वो अपने मुख से उस रस की शहद के रूप में उल्टी करती है, जो पवित्र कार्यों में उपयोग किया जाता है।
  4. शव कर्पटम् – रेशमी वस्त्र, धार्मिक कार्यों को सम्पादित करने के लिए पवित्रता की आवश्यकता रहती है। रेशमी वस्त्र को पवित्र माना गया है, पर रेशम को बनाने के लिए रेशमी कीड़े को उबलते पानी में डाला जाता है और उसकी मौत हो जाती है। उसके बाद रेशम मिलता है, तो हुआ शव कर्पट, फिर भी पवित्र है।
  5. काक विष्टा – कौए का मल, कौवा पीपल पेड़ों के फल खाता है और उन पेड़ों के बीज अपनी विष्टा में इधर-उधर छोड़ देता है, जिसमें से पेड़ों की उत्पत्ति होती है। आपने देखा होगा कि कहीं भी पीपल के पेड़ उगते नहीं हैं, बल्कि पीपल काक विष्टा से उगता है, फिर भी पवित्र है।
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मंदिर में दर्शन

मंदिर में दर्शन के बाद बाहर सीढ़ी पर थोड़ी देर क्यों बैठा जाता है?

बड़े बुजुर्ग कहते हैं कि जब भी किसी मंदिर में दर्शन के लिए जाएं, तो दर्शन करने के बाद बाहर आकर मंदिर की पैड़ी या ऑटले पर थोड़ी देर बैठना चाहिए। क्या आप जानते हैं इस परंपरा का क्या कारण है?

आजकल लोग मंदिर की पैड़ी पर बैठकर अपने घर, व्यापार, और राजनीति की चर्चा करते हैं, परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई थी। वास्तव में, मंदिर की पैड़ी पर बैठकर हमें एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक आजकल के लोग भूल गए हैं। आप इस श्लोक को सुनें और आने वाली पीढ़ी को भी इसे बताएं। यह श्लोक इस प्रकार है:

अनायासेन मरणम्, बिना देन्येन जीवनम्।
देहान्ते तव सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम्।।

इस श्लोक का अर्थ है:

अनायासेन मरणम् – अर्थात बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर पड़े-पड़े, कष्ट उठाकर मृत्यु को प्राप्त ना हों। चलते-फिरते ही हमारे प्राण निकल जाएं।

बिना देन्येन जीवनम् – अर्थात परवशता का जीवन ना हो। मतलब हमें कभी किसी के सहारे ना पड़े रहना पड़े, जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है। ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सके।

देहांते तव सानिध्यम् – अर्थात जब भी मृत्यु हो, तब भगवान के सम्मुख हो। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख जाकर खड़े हो गए थे और उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।

देहि मे परमेश्वरम् – हे परमेश्वर, ऐसा वरदान हमें देना।

यह प्रार्थना करें। गाड़ी, लाडी, लड़का, लड़की, पति, पत्नी, घर, धन यह सब नहीं मांगना है। यह तो भगवान आपकी पात्रता के हिसाब से खुद आपको देते हैं। इसीलिए दर्शन करने के बाद बैठकर यह प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए। यह प्रार्थना है, याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है, जैसे कि घर, व्यापार, नौकरी, पुत्र, पुत्री, सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है, वह याचना है और वह भीख है।

हम प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना का विशेष अर्थ होता है – विशिष्ट, श्रेष्ठ। अर्थना अर्थात निवेदन। ठाकुर जी से प्रार्थना करें और प्रार्थना क्या करना है, यह श्लोक बोलना है।

जब हम मंदिर में दर्शन करने जाते हैं, तो खुली आंखों से भगवान को देखना चाहिए, निहारना चाहिए। उनके दर्शन करना चाहिए। कुछ लोग वहां आंखें बंद करके खड़े रहते हैं। आंखें बंद क्यों करना? हम तो दर्शन करने आए हैं। भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का, मुखारविंद का, श्रंगार का, संपूर्ण आनंद लें। आंखों में भर लें स्वरूप को। दर्शन करें और दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठें तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किए हैं, उस स्वरूप का ध्यान करें।

मंदिर में नेत्र नहीं बंद करना। बाहर आने के बाद पैड़ी पर बैठकर जब ठाकुर जी का ध्यान करें, तब नेत्र बंद करें। अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और भगवान का दर्शन करें। नेत्रों को बंद करने के पश्चात उपरोक्त श्लोक का पाठ करें।

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दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम

एक समय की बात है श्री गुरू नानक देव जी महाराज और उनके दो शिष्य, बाला और मरदाना, किसी गाँव में जा रहे थे। चलते-चलते रास्ते में एक मकई का खेत आया। बाला स्वभाविक रूप से बहुत कम बोलता था, मगर मरदाना बातों की तह में जाना पसंद करता था। मकई का खेत देखकर मरदाने ने गुरू नानक जी महाराज से सवाल किया, “बाबा जी, इस मकई के खेत में जितने दाने हैं, क्या वे सब पहले से निर्धारित कर दिए गए हैं कि कौन उनका हकदार है और ये किसके मुँह में जाएँगे?”

इस पर गुरू नानक जी महाराज ने कहा, “बिल्कुल मरदाना जी, इस संसार में कहीं भी कोई भी खाने योग्य वनस्पति है, उस पर मोहर पहले से ही लग गई है और जिसके नाम की मोहर होगी वही जीव उसका ग्रास करेगा।”

गुरू जी की इस बात ने मरदाने के मन में कई सवाल खड़े कर दिए। मरदाने ने मकई के खेत से एक मक्का तोड़ लिया और उसका एक दाना निकाल कर हथेली पर रख लिया। फिर वह गुरू नानक जी महाराज से पूछने लगा, “बाबा जी, कृपा करके आप मुझे बताएँ कि इस दाने पर किसका नाम लिखा है।”

गुरू नानक जी महाराज ने जवाब दिया, “इस दाने पर एक मुर्गी का नाम लिखा है।” मरदाने ने गुरू जी के सामने बड़ी चालाकी दिखाते हुए मकई का वह दाना अपने मुँह में फेंक लिया और कहने लगा, “कुदरत का यह नियम तो बड़ी आसानी से टूट गया।”

जैसे ही मरदाने ने वह दाना निगला, वह दाना उसकी श्वास नली में फंस गया। अब मरदाने की हालत तीर लगे कबूतर जैसी हो गई। मरदाने ने गुरू नानक देव जी को कहा, “बाबा जी, कुछ कीजिए नहीं तो मैं मर जाऊँगा।”

गुरू नानक देव जी महाराज ने कहा, “मरदाना जी, मैं क्या करूँ? कोई वैद्य या हकीम ही इसको निकाल सकता है। पास के गाँव में चलते हैं, वहाँ किसी हकीम को दिखाते हैं।” मरदाने को लेकर वे पास के एक गाँव में चले गए। वहाँ एक हकीम मिला। उस हकीम ने मरदाने की नाक में नसवार डाल दी। नसवार बहुत तेज थी। नसवार सूंघते ही मरदाने को छींके आनी शुरू हो गईं। मरदाने के छींकने से मकई का वह दाना गले से निकल कर बाहर गिर गया। जैसे ही दाना बाहर गिरा, पास ही खड़ी मुर्गी ने झट से वह दाना खा लिया।

मरदाने ने गुरू नानक देव जी से क्षमा माँगी और कहा, “बाबा जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपकी बात पर शक किया।”

हम जीवों की हालत भी ऐसी ही है। हम इस त्रिलोक में फंसे हुए अंधे कीड़े हैं, जो दर-दर की ठोकरें खाते हैं और खुद को बहुत सियाना समझते हैं। बड़े अच्छे भाग्य से हमें यह शरीर मिला है, बड़े भाग्य से सेवा मिली, सत्संग मिला और सतगुरु ने हम जैसे कीड़ों की जिम्मेदारी लेकर नामदान की बख्शिश भी कर दी। मगर क्या हमने बाबा जी का कहना माना? क्या हमारे संशय खत्म हो गए?

बाबा जी ने हम अंधों को अपना हाथ पकड़ाया है और वह सत्पुरुष हम जीवों को परमात्मा से जरूर मिलाएगा। हमें बिना किसी तर्क-वितर्क, कैसे, क्यों, कहाँ को छोड़कर गुरू का हुक्म मानना चाहिए।

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लोभ छलता है

किसी नगर में एक बहुत ही संपन्न सेठ रहता था। उसका व्यापार दिन दूनी और रात चौगुनी उन्नति कर रहा था। इतनी समृद्धि के बावजूद सेठ का लोभ बढ़ता ही जा रहा था। वह अधिक से अधिक धन कमाने में लगा रहता और कंजूस इतना कि किसी याचक को एक कौड़ी नहीं देता था।

एक दिन उसके द्वार पर एक फक्कड़ साधु आया और उससे कुछ देने की प्रार्थना की। उस दिन सेठ को न जाने क्या हुआ कि उसने एक पैसा साधु की झोली में डाल दिया। साधु उसे भगवान का प्रसाद देकर आशीर्वचन कहता हुआ चला गया।

सेठ तब आश्चर्यचकित रह गया, जब शाम को उसे प्रसाद के दोने में सोने की एक अशर्फी प्राप्त हुई। अशर्फी मिलने से उसे एक ओर जहां अत्यंत प्रसन्नता हुई, वहीं अफसोस भी हुआ कि उसने साधु को एक पैसा ही क्यों दिया।

अगले दिन साधु फिर आया। लोभी सेठ तो उसकी प्रतीक्षा में ही बैठा था। इस बार साधु के झोली फैलाते ही सेठ ने मुट्ठीभर पैसे उसमें डाल दिए। साधु पुन: उसे प्रसाद व आशीष देकर चला गया। सेठ शाम होने की प्रतीक्षा करने लगा। रात हो गई, लेकिन अशर्फी प्राप्त नहीं हुई।

सेठ अब सिर धुनने लगा कि मेरे पैसे भी चले गए और अशर्फी भी नहीं मिली।

तभी सेठ की धर्मपरायण पत्नी ने उसे समझाया, “दुख मत मनाइए, यह सबक लीजिए कि त्याग फलता है, जबकि लोभ छलता है।” पत्नी की इस बात ने सेठ की आंखें खोल दीं।

कथा का सार यह है कि नि:स्वार्थ भाव से किया गया दान हमेशा अच्छा प्रतिफल देता है, जबकि इसके विपरीत स्थिति में किया गया दान न उपलब्धि देता है, न आत्मसंतोष।

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