संत कबीर का उपदेश

संत कबीर जी पेड़ों की झुरमट तले बैठे थे | उनके पास की एक शाखा पर एक पिंजरा टंगा था, जिसमें एक मैना फुदक रही थी | बड़ी अनूठी थी, वह मैना | खूब गिटरपिटर मनुष्यों की सी बोली बोल रही थी | कबीर जी भी उससे बातें कर रहे थे |

इतने में, नगर सेठ अपनी पत्नी के साथ कबीर जी के क़दमों में हाज़िर हुआ | मन की भावना रखी – ‘महाराज, मेरे सिर के बाल पक चले हैं | घर-गृहस्थी के दायित्व भी पूरे हो गए हैं | सोच रहा हूँ, हमारी सनातन परम्परा के चार आश्रमों में से तीसरी पौड़ी ‘वानप्रस्थ’ की और बढ़ चलूँ | एकांत में सुमिरन-भजन करूँ |’

कबीर, बिना किसी लाग-लपेट के, एकदम खरा बोले- ‘सेठ जी, यूँ वन में इत-उत डोलने से हरि नहीं मिलता!’

सेठ – फिर कैसे मिलता है, हरि ? आप बता दें महाराज |

कबीर फिर मैना से बतियाने लगे – ‘मैना रानी, बोल – राम…राम… !’ मैना ने दोहराया – ‘राम…राम |’ कबीर उससे ढेरों बातें करने लगे | सेठ-सेठानी को इतना साफ बोलते देखकर खुश हो रहे थे… कि तभी कबीर उनकी और मुड़े और बोले – ‘जानते हो सेठ जी, मैना को मनुष्यी बोली कैसे सिखाई जाती है? आप उसके सामने खड़े होकर उसे कुछ बोलना सिखाओगे, तो वह कभी नहीं सीखेगी | इसलिए मैंने एक दर्पण लिया और उसकी आड़ में छिपकर बैठ गया | दर्पण के सामने पिंजरा था | मैं दर्पण के पीछे से बोला – ‘राम! राम!’ मैना ने दर्पण में अपनी छवि देखी | उसे लगा उसका कोई भाई-बंधु कह रहा है- ‘राम! राम!’ इसलिए वह भी झट सीख और समझ गई | इसी तरह दर्पण की आड़ में मैंने उसे पूरी मनुष्यी बोली सिखाई | और अब देखो, यह कितना फटाफट बोलती है…!’

इतना कहकर कबीर ताली बजाकर हँस दिए | फिर इसी मौज में, सेठ-सेठानी से सहजता से बोल गए – ‘ऐसे ही सेठ जी भगवान कैसे मिलता है, यह तो खुद भगवान ही बता सकता है | लेकिन अगर वह यूँ ही सीधा बताएगा, तो तुम्हारी बुद्धि को समझ नहीं पड़ेगी | इसलिए वह मानव चोले की आड़ में आता है और ब्रह्मज्ञान का सबक सिखाता है – ब्रह्म बोले काया के ओले | काया बिन ब्रह्म कैसे बोले || वह मानव बनकर आता है, मानव को अपनी बात समझाने | उस महामानव को, मनुष्य देह में अवतरित ब्रह्म को ही हम ‘सतगुरू’ सच्चा गुरु या साधू’ कहते हैं |

निराकार की आरसी, साधों ही की देहि |

लखा जो चाहै अलख को, इनही में लखि लेहि ||

अर्थात सदगुरू की साकार देह निराकार ब्रह्म का दर्पण है | वो अलख (न दिखाई देने वाला) प्रभु सच्चे गुरू की देह में प्रत्यक्ष हो आता है |

इसलिए सेठ जी, अगर भगवान को पाना है, तो ‘वानप्रस्थ’ नहीं, ‘गुरूप्रस्थ’ बनो | सदगुरू के देस चलो –

चलु कबीर वा देस में,

जहँ बैदा सतगुरू होय

सेठ – सोलह आने सच बात, महाराज | मगर एक दुविधा है | दास जानना चाहता है कि मनुष्य चोले में तो कई पाखंडी स्वयं को ‘गुरू’ कहलाते घूमते हैं | फिर हम ज्ञानीजन कैसे पहचाने कि इस काया में साकार ब्रह्म है या कोई ढोंगी है ?

कबीर ने प्रशंसा भरी दृष्टि से सेठ जी को देखा – ‘उत्तम प्रश्न किया है आपने |

जब तक देखूं न अपनी नैनी, तब तक पतीजूं न गुरू की वैणी

– सोच-समझ कर, देखभाल कर ही किसी को सदगुरु दर्जा देना चाहिए |

भई, मैं अपनी राय कहूँ, तो –

साधो सो सतगुरू मोहिं भावै | सत नाम नाम का भरि भरि प्याला, आप पिवै मोहिं प्यावै ||

मुझे तो ऐसा सदगुरु भाता है, जो प्रभु के अव्यक्त आदिनाम का अमृत मुझे पिला दे |

परदा दूरि करै आँखिन का, निज दरसन दिखलावै | जा के दरसन साहिब दरसै, अनहद सबद सुनावै |

जो प्रभु की सिर्फ मीठी-मीठी बातों में न बहलाए | बल्कि मेरी आँख पर से अज्ञानता का पर्दा हटा दे, मेरा शिव – नेत्र (दिव्य दृष्टि) खोल दे और साहिब का साक्षात् दीदार करा दे, और मेरे अंतर्जगत में अनहद बाणी गूँज उठे… वही पूरा तत्वदर्शी गुरू है | वही सत्पुरश है |’

उधर सेठ-सेठानी और इधर हंस मनमुखा गदगद हो चुके थे | दोनों हंसों को ‘गुरू क्यों? और गुरू कैसा?’ – इन दो सीखों के बेशकीमती मोती मिल चुके थे | वे उन्हें अपनी चोंच से चुग कर, ‘संतों के देस’ से वापिस लौट रहे थे |

आपके अंदर के हंस

आपके अंदर ही ये दोनों हंस रहते हैं – आपका मन (मनमुखा) और आपकी आत्मा (आत्माराम) | आपका हंस आत्माराम परमात्मा के दर्शन के लिए व्याकुल है | पर हंस मनमुखा उसका साथ देने को तैयार नहीं होता | माने वह किसी सदगुरु, तत्वदर्शी सत्पुरश से ज्ञान-दीक्षा लेने के लिए राजी नहीं होता | पर अब तो आपके दोनों हंसों ने ‘संतों के देस’ की सैर कर ली है और सत्संग के मोती भी पा लिए हैं | तो क्या अब आपका ‘मनमुखा’ माना ?

यदि अब भी नहीं माना, तो उसे बारम्बार संस्थान के सत्संग पंडालों में लाना न भूलें, ताकि वह संतों की और वाणियाँ सुन पाए और यदि वह मान गया, तो फिर विलम्ब न कीजिए | ‘ब्रह्मज्ञान’ की दीक्षा पाकर ‘सुख’ से आनंद की ओर बढ़ जाइए |

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